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कृपया, घंटी बजायें

          रविवार को जब भी कोई कार्यक्रम होता है, लगता है कोई आपकी निजता पर हस्तक्षेप कर रहा है। इंडीब्लॉगर उत्साही ब्लॉगरों की एक संस्था है जो ब्लॉगिंग को न केवल विचारों को परिष्कृत करने का साधन मानती है, वरन उसे सामाजिक कार्यों को प्रचारित प्रसारित करने का सशक्त माध्यम भी बनाना चाहती है। इसी श्रंखला में जब उनका एक निमन्त्रण आया तो मैं मना नहीं कर पाया। कार्यक्रम दोपहर में था, घर के पास था, सोचा थोड़ा टहलना भी हो जायेगा और साथ साथ ज्ञानवर्धन भी।

          RtB

          अपराध में व्यवधान, संभव है समाधान

          यह कार्यक्रम नारी के प्रति बढ़ते अपराधों से समाज को बचाने के उपायों पर चर्चा के लिये हो रहा था। घंटी बजाने का आशय मुझे पहले स्पष्ट नहीं हो पाया था, लगा कि अलख जगाने के भावार्थ से प्रेरित होगा यह नारा। वृहद आशय निश्चय ही वही था, पर यह जिस घटना विशेष से प्रेरित था, उसमें घंटी बजाने का उपयोग सच में किया गया था। आपने एक प्रचार देखा होगा, एक परिवार से लड़ने झगड़ने की आवाजें आ रही हैं। बहुधा पड़ोसी इसे उस परिवार की व्यक्तिगत समस्या और शेष पड़ोस का मनोरंजन मानते हैं, एक चटपटी खबर जो बन जाती है यह। क्रोधपूर्ण वाकयुद्ध में बहुधा घर के रहस्य भी बाहर आ जाते हैं, एक दूसरे के ऊपर किये दोषारोपण, सुनी सुनायी बातें, और न जाने क्या क्या। बहुत कम ही देखा है कि कोई पड़ोसी जाये और उसे रोकने का प्रयास करे। ऐसे में एक युवक उठता है, उस घर के बाहर पहुँचता है, घंटी बजाता है। झगड़ा सहसा रुक जाता है, ऐसे व्यवधान प्रायः नहीं होते थे। पूछे जाने पर युवक तनिक कठोर स्वर में कहता है कि उसके घर बिजली नहीं आ रही है, वह बस यह देखने आया है कि आप के घर बिजली आ रही है या नहीं।

          उपाय आपको थोड़ा विनोदपूर्ण लग सकता है, पर यह व्यवधान आवश्यक है और प्रभावी भी। झगड़े में लगे हुये युगल को तो लगता है कि सामने वाले ने उसका पूरा विश्व दूषित और कलुषित कर दिया है, अब बिना उसे निपटाये आगे बढ़ने का कोई मार्ग ही नहीं है। उन्हें उस घातक तारतम्यता से बाहर निकालने का कार्य करता है, यह घंटी बजाना। यह व्यवधान नहीं, समाधान की दिशा में सोचने के लिये प्रेरित करने का कार्य है। कई बार यह कार्य घर में बच्चे बड़े ही रोचक ढंग से करते हैं, आपके मन मुटाव को कोई महत्व न देते हुये आपसे कोई दूसरा प्रश्न पूछ बैठते हैं। आपका ध्यान बट जाता है और क्रोध का त्वरित कारण भी। पारिवारिक झगड़ों में ही नहीं वरन नारी के प्रति हो रहे किसी भी अपराध में सचेत करता हुआ संकेत ही घंटी बजाना है, हो रहे अपराध की मूढ़ता की लय तोड़ना ही घंटी बजाना है।

          विषय संवेदनशील था अतः मुँह खोलने के पहले वहाँ उपस्थित समुदाय की मनःस्थिति को समझ लेना आवश्यक था। लोग बोलते रहे, चर्चा रोचक होती रही, कुछ बोलने से अधिक सुनने में रुचि बढ़ती रही। लगभग १५० ब्लॉगरों के ऊर्जावान और ज्ञानस्थ समूह की चर्चा के निष्कर्षों को समझना आवश्यक था मेरे लिये। मन में कुछ बिन्दु थे जो सोच कर गया था, कहने के लिये, पर अन्त में बिना कुछ बोले, ज्ञानमद छाके ही वापस चला आया, टहलता हुआ।

          ब्लॉगर किसी विषय पर मंथन करें तो दो लाभ दिखते हैं। पहला तो विषय पर दृष्टिकोण वृहद और स्पष्ट हो जाता है। लिखने की प्रक्रिया में पढ़ने और समझने की दक्षता प्राप्त करते रहने से समस्या की परत खोलने में विशेष प्रयास नहीं करना पड़ता है। किसी भी बुद्धिजीवी के लिये चर्चा में एक आधारभूत समझ का उपस्थित होना आवश्यक है, वह हर बार शून्य से प्रारम्भ नहीं कर सकता। कई बार ऐसी समस्याओं पर जब कई दिशाओं से ऊटपटाँग वक्तव्य टपकते हैं तो लगता है कि उन मूढ़ों को मूल से प्रशिक्षित किये जाने की आवश्यकता है। ब्लॉगरों के बीच चर्चा का स्तर बना रहता है, लुढ़कता नहीं है। दूसरा लाभ यह है कि यदि ब्लॉगर किसी विषय को हृदयस्थ करेंगे तो उसे व्यक्त भी करेंगे, उस चर्चा को ब्लॉग के माध्यम से और विस्तार मिलेगा और प्रचार मिलेगा।

          ब्लॉगरीय संवेदन

          ब्लॉगरीय संवेदन

          चर्चा में दो विचारधारायें प्रमुख थीं। पहली उन महिलाओं की, जो पारिवारिक हिंसा की या तो स्वयं भुक्तभोगी रही हैं या उन्होनें वह ध्वंस बहुत पास से देखा, या कहें कि जिन्होंने इसका तीक्ष्ण पक्ष जिया है। दूसरी विचारधारा उस समूह की थी, जो सदा ही परिवार को अधिक महत्व देता रहा क्योंकि उसकी दृष्टि में परिवार ही सहजीवन की मौलिक ईकाई है। एक समूह परिवार को बन्धन मान बैठा था, तो दूसरा उसे पोषक। एक समूह परिवार को दो व्यक्तियों के स्वातन्त्र्य का अखाड़ा मान रहा था जिसमें अधिकारों की जीत का स्वर निनाद करे, तो दूसरा परिवार को एक यज्ञक्षेत्र मान रहा था जहाँ दोनों अपने अहम स्वाहा कर फल पर स्वयं को केन्द्रित करें। दोनों ही तथ्य कह रहे थे, दोनों ही सत्य कह रहे थे।

          मैं मौन सुन रहा था, समझ नहीं पा रहा था व्यक्तिगत और संस्थागत सिद्धान्तों का घर्षण। जब ऐसा ही मौन कुछ दिनों पहले स्वप्न मंजूषाजी की पोस्ट पर व्यक्त किया था तो एक झिड़की मिली थी, व्यक्त न करना कर्तव्यों से मुँह मोड़ने सा समझा गया, व्यक्त न करना बुद्धिजीविता का अपमान समझा गया। अपना द्वन्द उन्हें समझाया तो अभयदान मिल गया, सोचने का समय मिल गया और साथ ही मिला स्वयं को कहने का अवसर। चिन्तन परिवार के पक्ष में लगभग करवट ले ही चुका था कि आज की चर्चा ने पुनः सब उथल पुथल कर डाला।

          विश्व को देखें तो तोड़ने वालों की संख्या बहुत अधिक रहती है, तोड़ना बहुत सरल है, जोड़ना बहुत कठिन। व्यक्ति पूरे मानव समाज को अब तक तोड़ता ही तो आ रहा है। धर्म, जाति, राष्ट्र, राज्य, भाषा, वर्ण और न जाने क्या क्या। जहाँ एक ओर तोड़कर उसका विश्लेषण उस पर नियन्त्रण सरल हो जाता, जोड़ने में न जाने कितने व्यक्तित्वों को एक सूत्र में पिरोना पड़ता है, कितनी विचारधाराओं, रुचियों और प्रवृत्तियों को एक दिशा देनी पड़ती है। सहजीवन के उपासकों को सदा ही जोड़ने की दिशा में बढ़ते पाया है, परिवार को महत्व देने वालों को सदा ही कठिन मार्ग पर चलते पाया है।

          एक साम्य, दो जन्म सुवासित

          एक साम्य, दो जन्म सुवासित

          क्या पारिवारिक तनाव से ग्रस्त जन संबंध तोड़ दें? उपस्थित कुछ महिलायें ही इस विचारधारा की थीं, उन्होंने निश्चय ही प्रताड़ना सही होगी। कितना दुख असहनीय है, यह परिभाषित करना होता है, उस दुख की तुलना में जो परिवार के न होने की दशा में आता है। परिवार न होने का दुख निश्चय ही अधिक है पर कुछ लोग उसे वहन कर सकते हैं, वर्तमान के नर्क से निकलने के लिये। समाज के स्वरूप के विरुद्ध कुछ सक्षम लोग तो चल सकते हैं पर वह सबके लिये उदाहरण नहीं बन सकता, सहजीवन हमारे लिये आमोद का विषय नहीं वरन आवश्यकता का आधार है। एक व्यक्ति से निर्वाह नहीं हो रहा है तो वह जीवन की राहों का अंत नहीं है, स्थितियों में सुधार के उदारमना और निष्कपट प्रयास हों, यदि फिर भी संभव न हो तो निश्चय ही दूसरा परिवार बसाया जाये, पर परिवार सदा ही प्रमुखता से रहे।

          परिवार सदा ही एक आधार रहेगा, कुरीतियों से लड़ने का, समाज में संबल संचारित करने का। परिवार रहे और उसमें बेटे और बिटिया को समान प्यार और आश्रय मिले। बिटिया को आश्रय देना है तो अपराध हर हाल में रोकने पड़ेंगे। हम एक बार भुगत चुके हैं। मध्ययुगीन भारत की परिस्थितियों में नारियों ने जो सहा है, वह अवर्णनीय है। सतीप्रथा, बालविवाह, पर्दाप्रथा, बालिकावध, सब के सब सामाजिक नपुंसकता के प्रक्षेपण रहे हैं, हम अपनी बिटियों की रक्षा करने में अक्षम रहे हैं। उनको जिलाकर सम्मान देने के स्थान पर उन्हें मारकर और जल्दी ब्याहकर सम्मान बचाते आये हैं। आज भी परिस्थितियाँ उसी राह जा रही हैं, समाजिक पक्षाघात की आशंका पुनः अपने संकेत भेज रही है। सोचना होगा, क्यों कोई महिला अपनी बिटिया को इस असुरक्षित समाज में आने से मना करती है। श्वेता की यह कविता उसी वेदना के स्वर हैं, वह चीत्कार है जिसे हम सुनने से कतराते हैं।

          तो उठें और हस्तक्षेप करें, हो सके तो सक्रिय, और यदि न हो सके तो कम से कम घंटी अवश्य बजा दें, अपराध में व्यवधान उत्पन्न अवश्य कर दें।

          This post originally appeared on न दैन्यं न पलायनम्

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