नहीं बनना है मुझे
कभी गंगा सी पवित्र
जिसमे डाल जाओ तुम
अपने मन चाहे अवशिष्ट
ना बहना है मुझे
तुम्हारी काटी हुई
चट्टानों पर
मैं बहती आई हूँ
अपनी बनायीं हुई
ढलानों पर
मैं वो धारा नहीं अब
जिसे बाँध सके कोई
शंकर अपनी जटाओं में
मैं सिर्फ प्यास बुझाने का
एकमात्र साधन नहीं
हर कोने कोने यहाँ एक गंगा है बसी
जो अपवित्र होने के लिए ही
पवित्र हुई
नहीं बनना है मुझे
कभी गंगा सी पवित्र
नहीं करनी है भागीदारी
मुझे तुम्हारे पापों में
ना होने दूंगी अपने प्रवाह में
तुम्हारा अनवांछित
हस्तछेप !!
- Deepika Gupta
Breakthrough Rights Advocate, Lucknow
brilliantly written…
Ossam…
Its the right time, to have such beautiful poems in school sylabus books.